हजारों टन भंडारण का असली मालिक कौन ? बड़ा सवाल

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0.8% की मार्जिन क्या देती है कोयला भंडारण व बिक्री मालिकाना हक?

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ओबरा/सोनभद्र। रेलवे विभाग के एक टेंडर ने ओबरा वासियों को आश्चर्यचकित कर दिया है और इसी टेंडर की आड़ में रेलवे परिसर व आसपास तीन स्थान पर कोयला के स्टॉक इकट्ठे हैं। जिनका इस्तेमाल कोल डिपो के रूप में किया जा रहा है क्योंकि इन स्थानों से जो कोई चाहे अधिक दामों पर कोयला ले जा सकता है क्योंकि उन स्थानों पर कोई वैध परमिट नहीं मिलेगा इसलिए वहां पर परमिट का जुगाड़ स्वयं करना होगा अर्थात परमिट कहीं का और माल कहीं का तभी उसका परिवहन किया जा सकता है सबसे बड़ी बात यह है कि ओबरा थर्मल पावर को भेजा गया कोयला जो कि एनसीएल से लाया जाता है में परियोजना द्वारा रेलवे को इस कोयले का भाड़ा भी दिया जाता है और यह कोयला ओबरा थर्मल पावर के लिए आता है फिर इतना बड़ा स्टॉक जो लगातार चार महीना से बेचा जा रहा है सूत्रों के अनुसार खबर लगाने के बाद स्टाफ कर्ताओं द्वारा इस स्टॉक को जल्दी खपत कर देने की फिराक में है। प्रारंभ में बड़े पैमाने पर खाली रैक कोयला उगल रहे थे जो की अब लगातार खबरों के प्रकाशन के कारण
सभी के संज्ञान में आने के बाद रैकें उतना कोयला नहीं उगल रही जो कि पहले उगल रही थी फिर भी हजारों टन का कोयला स्टॉक के रूप में मौजूद है और लगभग उतना ही कोयला बेचा जा चुका है। रेलवे व तापीय परियोजनाओं के अनुसार रेलवे की माल की धुलाई के दौरान 0. 8% की मार्जिन क्षम्य है क्योंकि यह माना जाता है कि एनसीएल से लेकर थर्मल पावर के बीच में रास्ते पहाड़ों से होकर गुजरते हैं व टेढ़े-मेढ़े पहाड़ों के कारण कुछ माल कम प्राप्त हो सकता है जिसकी मात्रा 0.8% मानी जाती है किंतु यहां हजारों टन का इतना बड़ा स्टॉक कोयला मौजूद है। जबकि सूत्रों के अनुसार लगभग इतना ही कोयला बेचा जा चुका है इस पूरे खेल में कितनी सच्चाई है स्थानीय लोगों के अनुसार कुछ व इस खेल से जुड़े लोगों के अनुसार कुछ। मामला कुछ भी हो पर हजारों टन का कोयला आंखों के सामने दिखाई दे रहा है और लगातार बड़ी गाड़ियों से कोयला का अवैध परिवहन भी हो रहा है अब देखना यह है कि राज्य सरकार , केंद्र सरकार है तथा ओबरा तापीय परियोजना, एनसीएल अथवा रेलवे विभाग में से यह कोयला किसका है या असल में इसका मालिक कौन है क्योंकि यह सब को पता है कि यह कोयला एनसीएल से चलकर ओबरा तापीय परीयोजना के लिए आता है अब देखना यह है कि उच्च अधिकारियों द्वारा क्या कार्रवाई की जाती है अथवा इस कोयले के भंडारण और बिक्री के बीच केंद्र व राज्य सरकार के राजस्व की भारी क्षति की वसूली कैसे की जाती है देखना दिलचस्प होगा कि ओबरा डैम पर यह कोयला स्टॉक कब तक बेचा जाता है जबकि रेलवे की अपनी स्थिति स्पष्ट है कि वह इस टेंडर को इसलिए जारी किया है कि रैकों की सफाई और मरम्मत सही ढंग से हो सके और कोयला अथवा इसमें लगाए गए किसी भी सामान की पूरी मात्रा जिसका है उसको मिल सके। इसके बाद प्राप्त अवशिष्ट को स्क्रैप के रूप में इसका टेंडर माना जा सकता है। इसी नीति के तहत इसका टेंडर किया गया है पर यहां मामला उलटा मालूम पड़ता है क्योंकि खाली रहकर इतना अधिक कोयला नहीं उगल सकती की हजारों टन कोयला जिसमें स्टीम कोयला भी है की बिक्री बड़े पैमाने पर की जा सके और वह यहां हो रहा है।