कांग्रेस पार्टी के नेता दरोगा पाठक आखिर किसके एजेंडे पर काम कर रहे हैं 27 सूत्रीय आंदोलन के बाद बंद कमरे की बैठकों ने खड़े किए गंभीर सवाल

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कांग्रेस पार्टी के नेता दरोगा पाठक आखिर किसके एजेंडे पर काम कर रहे हैं 27 सूत्रीय आंदोलन के बाद बंद कमरे की बैठकों ने खड़े किए गंभीर सवाल

 

सिंगरौली जिले के बंधा क्षेत्र में आदिवासियों, ग्रामीणों, विस्थापन, पेड़ कटाई और जमीन अधिग्रहण जैसे गंभीर मुद्दों को लेकर जिस 27 सूत्रीय आंदोलन को बड़े संघर्ष और जनआक्रोश के रूप में प्रस्तुत किया गया था, वह अब सवालों के घेरे में आ चुका है। आंदोलन के नाम पर जनता को सड़क पर उतारने वाले लोग अब अचानक खामोश क्यों हैं, यह सवाल पूरे क्षेत्र में गूंज रहा है।

 

सबसे ज्यादा चर्चा होटल सत्या में दरोगा पाठक और कंपनी से जुड़े बृजेश सिंह के बीच हो रही कथित गुप्त बैठकों को लेकर है। ग्रामीणों का सीधा आरोप है कि जिन लोगों ने मंच से कंपनी और प्रशासन के खिलाफ आग उगली, वही लोग अब बंद कमरों में बैठकर आखिर कौन सा सौदा तय कर रहे हैं?

 

13 मार्च को आंदोलन के दौरान बड़ी-बड़ी चेतावनियां दी गई थीं। कहा गया था कि 15 दिनों के भीतर मांगें नहीं मानी गईं तो पुतला दहन होगा, आमरण अनशन होगा और आंदोलन निर्णायक मोड़ लेगा। लेकिन हुआ बिल्कुल उल्टा। आंदोलन आगे बढ़ने के बजाय अचानक ठंडा पड़ गया और कुछ ही समय बाद कंपनी का भूमिपूजन होने लगा।

 

अब जनता पूछ रही है

 

क्या 27 सूत्रीय मांगें पूरी हो गईं? क्या विस्थापितों को न्याय मिल गया? क्या आदिवासियों की जमीन और जंगल बच गए? क्या युवाओं को रोजगार मिल गया?

 

अगर नहीं, तो फिर आंदोलन अचानक खत्म कैसे हो गया?

 

ग्रामीणों के बीच यह चर्चा तेज है कि करोड़ों रुपये के मुआवजे और जमीन अधिग्रहण जैसे मामलों में कहीं न कहीं अंदरखाने समझौते का खेल तो नहीं चल रहा। लोगों का कहना है कि यदि आंदोलन वास्तव में जनता के हित में था, तो फिर उसकी प्रगति और बैठकों की जानकारी सार्वजनिक क्यों नहीं की जा रही?

 

ग्रामीण यह भी आरोप लगा रहे हैं कि प्रभावित परिवारों को आज भी उचित मुआवजा नहीं मिला, स्थानीय युवाओं को रोजगार में प्राथमिकता नहीं दी गई, और आदिवासी क्षेत्रों में लगातार पेड़ों की कटाई व जमीनों पर कब्जे का खतरा बना हुआ है। इसके बावजूद आंदोलन की आवाज अचानक दब जाना कई सवाल खड़े करता है।

 

अब बंधा क्षेत्र की जनता साफ जवाब चाहती है 

 

क्या आंदोलन सिर्फ दबाव बनाने का माध्यम था? क्या जनता की भावनाओं का इस्तेमाल कर बाद में समझौता कर लिया गया? या फिर सच में कोई बड़ी डील पर्दे के पीछे हो चुकी है?