शास्त्र केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं है

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शास्त्र केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं है, बल्कि वे जीवन जीने की कला सिखाने वाले मार्गदर्शक भी है: लक्ष्मी सिन्हा

 

 

 

बिहार। शास्त्र स्पष्ट करते हैं कि मनुष्य का धर्म केवल पूजा- पाठ नहीं, बल्कि अपने कर्तव्यों का पालन करना भी है। शास्त्रों की शिक्षाएं हमें धैर्य, साहस और समाधान की राह दिखाती है। यह बातें अखिल विश्व सत्य सनातन संघ की प्रदेश अध्यक्ष (महिला प्रकोष्ठ) श्रीमती लक्ष्मी सिन्हा पटना में आयोजित एक धार्मिक कार्यक्रम के संबोधन में कहा उन्होंने आगे बहुत ही सरलता से विस्तारपूर्वक समझते हुए कहा कि आप जिस किसी भी धर्म से संबंध रखते हो, जब आप शास्त्रों से जुड़ी पुस्तकों को गहराई से अध्ययन करते हैं, तो यह केवल ज्ञानवर्धन का माध्यम नहीं रहता, बल्कि यह आपके विचारों, दृष्टिकोण और व्यक्तित्व में एक सकारात्मक और चमत्कारी परिवर्तन भी ला सकती है। याद रखिए हमारी संस्कृति की सबसे बड़ी धरोहर हमारा धर्मग्रंथि हैं। इसमें धर्म, संस्कृति, कर्तव्य व त्याग जैसे मूल्यों की गहराई से व्याख्या की गई है। जितने भी वेद, उपनिषद, पुराण, दर्शन, स्मृतियां, आरण्यक और ब्राह्मण ग्रंथ है, इन सभी का उपदेश एक ही है-मानव जीवन को श्रेष्ठ, संतुलित और समाजोपयोगी बनाना। इन ग्रंथो में बताया गया है कि एक अच्छा नागरिक कैसे बना जाए। जैसे तैत्तिरीय उपनिषद कहता है-‘सत्य बोलो और धर्म का पालन करो।’इसी तरह महाभारत में राष्ट्र धर्म की भावना है। वही अथर्ववेद में प्रकृति धर्म की बात है-‘माता भूमि: पुत्रोंऽहं पृथिव्या:। ‘बाल्मीकि रामायण में भगवान श्रीराम भी कहते हैं-‘आपि स्वणेंंमयी लंका न मे लक्ष्मण रोचते, जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।’अर्थात् मुझे सोने की लंका भी प्रिया नहीं, क्योंकि जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है। महोपनिषद् में मानव धर्म की व्याख्या करते हुए कहा गया है-‘वासुदेव कुटुम्बकम्’ यानी पूरा विश्व एक परिवार है और इसमें सेवा समर्पण व समानता की सामानत की भावना होनी चाहिए। हालांकि, बहुत से लोग के मन में यह सवाल भी उठे कि शास्त्र पढ़ना तो संतो या धर्म गुरुओं का काम है। हमारी रोजमार्ग की जिंदगी में भला इसका क्या काम? तो आपको बता दे कि शास्त्रों की विशेषता यही है कि उनके उपदेश सभी के लिए समान है, राजा हो या प्रजा। आज की पीढ़ी जिस वैश्विक वातावरण अर्थात् बाजारवाद में अपना जीवन मूल खोज रही है, उसे कहीं तृप्तिं नहीं मिल रही है। श्रीमती सिन्हा ने आगे कहा कि संबंध टूट रहे हैं, तनाव बढ़ रहा है, अपराध बढ़ रहे हैं। ऐसे में शास्त्र ज्ञान हमारे लिए फायदेमंद हो सकता है। हमारे ग्रंथो में ऐसी असंख्य बातें कही गई है, जिसका एक भी अंश जीवन में उतारा जाए तो मानव जीवन उत्कृष्ट हो सकता है। गोस्वामी तुलसीदास रामचरितमानस में कहा भी है कि ‘बिनु संतोष न काम नसाहीं। काम अक्षत सुख सपनेहुनाहीं।।’अर्थात् संतोष के बिना इच्छाओं का अंत नहीं होता। व्यक्ति शील, स्नेह भरा होना चाहिए। और परोपकार की भावना हृदय में होनी चाहिए। श्रीमद्भगवद्गीता में भी कहा गया है-‘नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति’अर्थात् अधिक या अत्यल्प भोजन, नींद या जागरण से योग नहीं होता, बल्कि संतुलित जीवनशैली से ही दुखो का नाश होता है। वही मनुस्मृति युवाओं को सिखाती है कि तप, ब्रह्मचर्य, अध्ययन, समय और क्रोध पर नियंत्रण, यह सभी एक सज्जन व्यक्ति के गुण हैं। अथर्ववेद भी कहता है कि ब्रह्मचर्य और तब से ही राजा राज्य की उन्नति करता है। लगभग पांच हजार वर्ष पूर्व हमारे मनीषियों ने महाभारत में बताया है कि एक श्रेष्ठ व्यक्ति को किन गुणों से युक्त होना चाहिए। इस संदर्भ में महाभारत के उद्योग पर्व में कहां गया है-‘अष्टोगुणा: पुरुष पुरुषं दीपयनि्त, प्रज्ञा च कौलयं च दम:क्षमा च। अनिश्र्यम चांनसूया च धर्म: सत्य चतपैश्चैवच। ‘अर्थात् बुद्धि, कुलीनता, इंन्द्रिय-समय, क्षमा, ईर्ष्या रहित जीवन और दोष रहित दृष्टि, धर्म, सत्य और तप इन्हीं गुणों के पालनपुर से व्यक्तित्व उभरकर सामने आता है। दुनिया का कोई भी धर्मग्रंथ ऐसा नहीं है, जो मानवता की सेवा को सबसे बड़ा धर्म न मानता हो। हम सभी सुखी जीवन की कामना करते हैं, मगर सुख के लिए आवश्यक मूल्यों, जैसे सत्य, संयम, त्याग और प्रेम का पालन नहीं करते। यही हमारे दुखों का कारण बनता है। श्री राम ने कहा है-‘तत्व प्रेम करू मम अरु तोरा,जानते प्रिया एक मन मोरा।’यानी सच्चा प्रेम वही है, जो एकात्मता लाए। यही प्रेम परिवार, समाज और राष्ट्रों के बीच शांति व कल्याण का आधार बन सकता है।