प्रत्येक मानव-शरीर में भी भगवान के दर्शन कीजिए: लक्ष्मी सिन्हा

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बिहार। परमात्मा ने मानव को ही ऐसी शक्ति दी है कि मानव अपनी शक्ति और बुद्धि का सदुपयोग कर सकता है। वह इस शक्ति और बुद्धि का उपयोग भगवान के लिए करता है, तब मृत्यु से पहले ही उसे परमात्मा के दर्शन होते हैं। यह बातें अखिल विश्व सत्य सनातन संघ की प्रदेश अध्यक्ष (महिला प्रकोष्ठ) श्रीमती लक्ष्मी सिन्हा ने आयोजित धार्मिक कार्यक्रम में अपने संबोधन में कहा उन्होंने बहुत ही सरल शब्दों में विस्तारपूर्वक समझाते हुए आगे कहा कि प्राय: मानव अपनी बुद्धि का उपयोग धन-प्राप्ति के लिए करता है और शक्ति का उपयोग भोग के लिए करता है। इससे वह अंतकाल में बहुत पछताते हैं। शक्ति और बुद्धि परमात्मा के लिए है। दुर्लभ मनुष्य-शरीर पाकार परमात्मा के दर्शन के लिए जो प्रयत्न नहीं करता है, वह स्वयं अपनी ही हिंसा करता है। जिसकी परमात्मा के दर्शन की इच्छा है, जो प्रभु के दर्शन के लिए प्रयत्न रहता है, उसे भले ही परमात्मा के दर्शन न हो, पर उसका मरण सुधरता है। अंत काल में उसे शांति प्राप्त होती है। उसका मरण मंगलमय होता है। किसी भी प्रकार के लौकिक सुख की इच्छा जिसके मन में रहती है, अंत काल में उसे बहुत संताप होता है। मानवेतर किसी प्राणी को प्रभु के दर्शन नहीं होते हैं। स्वर्ग के देवों को भी भगवान के दर्शन नहीं होते हैं। स्वर्ग में देव अति सुखी हैं। भले ही वे सुख भोग ले, पर उसे सुख का अंत तो है। संसार का एक नियम है-जहां सुख है, वहां दुख भी है। जो मर्यादा को छोड़कर सुख भोगता है। उसकी इच्छा चाहे न हो, उसे दुख भोगना ही पड़ता है। स्वर्ग के देव हमसे अधिक सुख भोगते हैं, उन्हें अति सुख मिलता है, फिर भी उन्हें शांति नहीं मिलती है। शांति तो परमात्मा के दर्शन से ही मिलती है। इससे देव भी ऐसी इच्छा रखते हैं कि उन्हें भारत में जन्म मिले। भारत भक्ति की भूमि है, स्वर्ग में नर्मदा जी नहीं है, गंगा जी नहीं है, साधु-सन्यासी नहीं है। वहां सभी भोगी जीव है। स्वर्ग भोग भूमि है। जिसने बहुत पुन्य एकत्रित किए हो, बस सुख भोगने के लिए स्वर्ग में जाता है। देव, भक्ति नहीं करते हैं। भक्ति मानव शरीर से ही होती है। मानव संसाधन रहने पर पाप छोड़ सकता है। सभी मानवेतर प्राणियों को भोग ही मिलता है। मानव-शरीर की यही विशेषता है कि मानव, विवेक से थोड़ा सुख भोग करें और भक्ति करें, तो उसे भोग और भगवान दोनों मिलते हैं। श्रीकृष्ण-दर्शन मानव-शरीर द्वारा ही हो सकते हैं। मानव में ऐसी शक्ति है। स्वर्ग के देव पुण्य का फल, सुख भोगते हैं। पशु, पाप का फल, दुख भोंगते हैं। पशु आत्मा को शरीर समझता है। शरीर से आत्मा अलग है, मानव इसे जानता है। ‘शरीर ही मैं हूं, शरीर ही आत्मा है’-ऐसा पशु समझते हैं। इससे वे शरीर सुख में मग्न रहते हैं। पशु का स्वभाव सुधरता नहीं है। बिल्ली जन्म से लेकर मृत्यु तक चूहे की हिंसा करती है। बिल्ली ने कभी चूहे की हिंसा करना छोड़ दिया हो, ऐसा सुना नहीं है। पशु अपने स्वभाव को नहीं छोड़ सकते। उसका स्वभाव एक सा रहता है। मानव चाहे तो अपने स्वभाव को सुधार सकता है। जप करने से, तथा सुनने से आपका स्वभाव सुधरेगा। सत्संग से स्वभाव सुधरता है। भक्ति करने से जीव में परमात्मा के सद्गुण आते हैं और तब मानव का स्वभाव सुधरता है। जिसका स्वभाव सुधरता है, उसे मृत्यु से पहले ही मुक्ति मिलती है। मानव चाहे तो पाप छोड़ सकता है और पुण्य कर सकता है। पशु पंछी नया पाप नहीं कर सकते हैं। देव, पुण्य नहीं कर सकते हैं। मानव चाहने पर पाप छोड़ सकता है। वह निरंतर भक्ति कर सकता है। निरंतर भक्ति करने पर भगवान के दर्शन होते हैं। परमात्मा के दर्शन से जीव कृतार्थ होता है। आपको लगता होगा कि मंदिर में तो मैं रोज प्रभु के दर्शन करता हूं, पर मंदिर में प्रभु के दर्शन तो सामान्य दर्शन है। कई व्यक्तियों को मंदिर में प्रभु दीख पढ़ते हैं, पर मंदिर के बाहर निकालने के बाद प्रभु नहीं दिखाई देते और प्रभु जब नहीं दिखाई देते, तब आंखें पाप करती है। मन बुरे विचार करने लगता है। मंदिर में भगवान की भक्ति करने वाला मानव, मंदिर के बाहर पाप करता है। अनेक बार मंदिर में दर्शन करते-करते भी मन बिगड़ता है। मंदिर में बहुत भीड़ हो जाने पर किसी का धक्का लग जाए, तो मन अशांत हो जाता है। कइयों को तो ठाकुर जी के समक्ष क्रोध आ जाता है। इससे यह सिद्ध होता है कि मंदिर में प्रभु के दर्शन उत्तम दर्शन नहीं है। साधारण दर्शन साधारण दर्शन से शांति भी साधारण ही मिलती है। श्रीमती सिन्हा ने आगे कहा कि थोड़ा सोचिए, मंदिर में आपको क्या दिखाई देता है? भगवान या मूर्ति? आप मांगने की प्राय: मूर्ति दिखाई देती है। आंख को भले ही मूर्ति दिखाई दे, वैष्णव ऐसी भावना रखते हैं कि यह मूर्ति नहीं, प्रत्यक्ष परमात्मा है। जिसका मन शुद्ध है, उसे उस भावान से मंदिर में मंदिर में भगवान दिखाई देते हैं। हृदय में भाव न हो तो मंदिर में पत्थर की मूर्ति दिखाई देती है भक्ति मंदिर में मूर्ति के दर्शन नहीं करते, परमात्मा के दर्शन करते हैं। आप बहुत प्रेम-भाव से प्रभु के दर्शन कीजिए। प्रभु के उपकार को अनुभूत करके थोड़ी स्तुति कीजिए। संकल्प कीजिए कि आज से मैंने पाप छोड़ दिए। आज से मैं भगवान की कथा सुनने वाला हूं। आज से मैं सत्कर्म करूंगा। अब मैं भगवान का हो गया हूं। मैं ऐसा ही बोलूंगा, जो मेरे भगवान को पसंद होगा। मैं ऐसा ही कार्य करूंगा, जो मेरे प्रभु को प्रिया होगा। आप मंदिर में जी भावान से भगवान के दर्शन करते हैं, इस तरह प्रत्येक मानव- शरीर में भी भगवान के दर्शन कीजिए। आपको कोई स्त्री दिखे, कोई पुरुष दिखे, तो ऐसी भावना कीजिए कि मैं जिन इष्टदेव की पूजा करता हूं, वे इस शरीर में विराजमान है। इससे शरीर में उसी को देव के दर्शन होते हैं, मानव के शरीर में देव के दर्शन के दर्शन करनी हो, तो देह को न देखिए। जो देह को देखता है, उसे देव नहीं दीख पडते हैं। वह देव से दूर हो जाता है।