वर्दी की हठधर्मिता या लोकतंत्र का गला घोंटने की साज़िश? मेरठ डीएसपी के ‘तुगलकी फरमान’ पर पत्रकारों का हल्लाबोल।

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मेरठ डीएसपी को अपने पुलिस महकमे से जलन या पत्रकारो से डर?

 

क्यों लड़ाना चाहती है पुलिस और पत्रकार को।

 

वरिष्ठ पत्रकार राम आसरे की खास रिपोर्ट

 

मेरठ/लखनऊ।

उत्तर प्रदेश में पुलिस प्रशासन और लोकतंत्र के चौथे स्तंभ यानी मीडिया के बीच टकराव की स्थिति चरम पर पहुंच गई है। मेरठ की डीएसपी (DSP) सौम्या अस्थाना द्वारा कथित तौर पर थानों में पत्रकारों की वीडियोग्राफी पर पाबंदी लगाने और मुकदमा दर्ज करने की चेतावनी ने एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। पत्रकारों ने इसे सीधे तौर पर ‘तुगलकी फरमान’ करार देते हुए मुख्यमंत्री और डीजीपी के उन आदेशों की अवहेलना बताया है, जिनमें पत्रकारों की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए थे।

 

क्या थानों में कुछ ‘काला’ छिपा रही है पुलिस

 

भारतीय मीडिया फाउंडेशन (BMF) नेशनल कोर कमेटी के संस्थापक ए के. बिंदुसार और यूनियन के राष्ट्रीय अध्यक्ष पंडित बालकृष्ण तिवारी ने इस फरमान पर तीखे सवाल उठाए हैं। उन्होंने पूछा है कि यदि थानों की कार्यप्रणाली पारदर्शी है, तो पुलिस को कैमरे से डर क्यों लग रहा है? क्या थानों के भीतर ऐसी संदिग्ध गतिविधियां हो रही हैं जिन्हें जनता की नजरों से बचाना जरूरी है?

संगठन ने मांग की है कि मीडिया पर प्रतिबंध लगाने की जगह, उत्तर प्रदेश सरकार पहले थानों के कोने-कोने में लगे सीसीटीवी कैमरों की निष्पक्ष जांच कराए कि वे काम कर रहे हैं या नहीं।

 

कानून बनाम मौखिक आदेश: संविधान की धज्जियां

 

पत्रकार संगठनों ने इस फरमान को असंवैधानिक बताते हुए निम्नलिखित कानूनी तर्क पेश किए हैं:

अनुच्छेद 19(1) (a): भारत का संविधान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है, जो प्रेस की स्वतंत्रता का मूल आधार है।

सार्वजनिक स्थान: थाना एक सार्वजनिक कार्यालय है, कोई निजी निवास नहीं। जनहित में वहां की स्थिति दिखाना अपराध नहीं, बल्कि पत्रकार का दायित्व है।

न्यायालय के फैसले: सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाईकोर्ट स्पष्ट कर चुके हैं कि प्रेस को बिना किसी वैध और ठोस कानूनी कारण के सूचना संकलन से नहीं रोका जा सकता।

क्योंकि प्रेस का साफ मतलब है “पब्लिक रिलेटेड इमरजेंसी सोशल सर्विस”फिर मीडिया को अपना काम करने से रोकने का तात्पर्य क्या है।

 

एफआईआर की धमकी: कानून का राज या मनमानी

 

सभी पत्रकार एवं मीडिया संगठन एवं यूनियन के मीडिया अधिकारी का कहना है कि एफआईआर तभी दर्ज हो सकती है जब कोई कानून का उल्लंघन हुआ हो। “पत्रकार का कैमरा अपराध नहीं है।” बिना किसी वैधानिक आधार के सिर्फ ‘मौखिक आदेश’ के दम पर डराना, सत्ता और पद का दुरुपयोग है।

एक बिंदुसार ने कहा कि यह पुलिस और पत्रकार के बीच में दूरी पैदा करने की डीएसपी की एक सूची समझी चाल है, मेरठ डीएसपी ऐसा क्यों करना चाहती हैं उन्हें पत्रकारों से डर है या अपने पुलिस महकमे से जलन यह बहुत बड़ा सवाल है?

भारतीय मीडिया फाउंडेशन एवं पत्रकारों ने कहा कि आज कैमरा रोका जा रहा है, कल सच बोलने वाली आवाज दबाई जाएगी।

मीडिया संगठनों ने केंद्र और राज्य सरकार से आधिकारिक बयान की मांग की,

भारतीय मीडिया फाउंडेशन नेशनल ने केंद्र और राज्य सरकार से इस पूरे प्रकरण पर आधिकारिक बयान जारी करने की अपील की है। उन्होंने पूछा है कि क्या एक डीएसपी रैंक का अधिकारी मुख्यमंत्री और डीजीपी के सुरक्षा संरक्षण संबंधी आदेशों से ऊपर है?

कानून का राज (Rule of Law) संविधान से चलता है, किसी अफ़सर की सनक से नहीं। वर्दी का रौब दिखाकर सच को दबाने की कोशिशें सफल नहीं होंगी।” — पंडित बालकृष्ण तिवारी, राष्ट्रीय अध्यक्ष

> यह मामला अब केवल मेरठ तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरे प्रदेश के पत्रकार जगत में आक्रोश की लहर दौड़ गई है। यदि शासन ने इस ‘तुगलकी फरमान’ पर लगाम नहीं लगाई, तो यह विवाद मानवाधिकार और प्रेस की आजादी की एक बड़ी लड़ाई का रूप ले सकता है।