बंधा कोल प्रोजेक्ट मुआवज़े की राशि बंटने से खिले ग्रामीणों के चेहरे अभी बड़ी संख्या में होना है मुआवज़े का भुगतान

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बंधा कोल प्रोजेक्ट मुआवज़े की राशि बंटने से खिले ग्रामीणों के चेहरे अभी बड़ी संख्या में होना है मुआवज़े का भुगतान

प्रशासन के स्तर भुगतान ने पकड़ी रफ्तार, अभी और तेजी की जरूरत प्रोजेक्ट में हो रही देरी से सरकार को प्रतिवर्ष हो रहा 300 करोड़ राजस्व का नुकसान

कंपनी जमा कर चुकी है 600 करोड़ से अधिक मुआवज़ा की राशि रोजगार और औद्योगिक संभावनाओं से वंचित हो रहे लोग यह दे रही है कंपनी

 

अवार्ड से विधि विरुद्ध एवं अपवर्जित संरचनाओं को भी मिलेगी एक निश्चित राशी  800 हेक्टेयर सीए लैंड पर हो रहा प्रतिपूरक वनीकरण भूमिहीनों को भी दिया जा रहा पीडिएफ का लाभ

 

जिला सिंगरौली। “मुआवजे का पैसा मिलने से मुझे पूंजी मिल गई जिसके कारण पिछले 6 महीने से बंद मेरी किराना की दुकान फिर से खुल गई। मैंने मुआवजे से मिले पैसे से न सिर्फ दुकान खोल ली बल्कि पास में ही जमीन खरीदकर अपने और अपने बच्चों के भविष्य को भी सुरक्षित कर लिया है”। यह कहना है बंधा गांव के निवासी परमेंश कुमार गुर्जर का । जिन्हें बंधा कोल प्रोजेक्ट के तहत मुआवज़े की अच्छी राशि मिली है। परमेश बताते हुए भावुक हो जाते हैं कि अपनी बंद पड़ी किराने की दुकान को फिर से खोल सके हैं । वे बताते हैं कि मुआवजे की राशि ने उनकी जीवन को फिर से एक गति दी है।

यह कहानी बंधा कोल प्रोजेक्ट के तहत मुआवज़े की राशि पाने वाले कई ग्रामीणों की है। दरअसल, जिले के औद्योगिक भविष्य को नई दिशा देने वाला बहुप्रतीक्षित बंधा कोल प्रोजेक्ट आज भी शुरू होने का इंतजार कर रहा है। इस बीच कुछ अच्छी खबर यह है कि कंपनी द्वारा ग्रामीणों के लिए करीब 629 करोड़ रुपये की मुआवजा राशि जमा किए जाने के बाद अब धीरे-धीरे उनके मुआवज़े का भुगतान प्रशासन द्वारा शुरू किया गया है । लेकिन अभी इसकी रफ़्तार ज़रा धीमी है। भुगतान बीते कुछ दिनों से विभागीय लिंक फेल होने की वजह से लंबित था, जिसने गुरुवार से फिर रफ्तार पकड़ी है। धीरे-धीरे मुआवजे का भुगतान किया जा रहा है। सूत्रों का बताना है कि संभवतया वित्तीय-वर्ष 25-26 के खत्म होने यानी 31 मार्च के बाद ही इस दिशा में और रफ्तार पकड़ने की उम्मीद है।

 

हालांकि प्रोजेक्ट के अधीन आरहे गांवो की मासूम जनता को कुछ लोग निजि स्वार्थ के लिए प्रोजेक्ट के विरोध में अभी भी ना केवल उकसा रहे हैं, बल्कि उन्हें भड़का कर जमीन समर्पण पत्र नहीं सौंपने दे रहे हैं। इस वजह से भी अवार्ड की राशि का वितरण प्रभावित हो रहा है।

 

महत्वपूर्ण बात यह है कि कंपनी द्वारा बंधा कोल प्रोजेक्ट के अतर्गत प्रशासन द्वारा अवार्ड से विधि विरुद्ध एवं अपवर्जित संरचनाओं को भी अनुदान स्वरूप एक निश्चित मुआवजे की राशी देने का फैसला किया गया है। साथ ही प्रोजेक्ट के लिए जिन 800 हेक्टेयर भूमि पर वनों की कटाई वन विभाग द्वारा की जानी है, उसके बदले प्रदेश के विभिन्न जिलों में इतनी ही जमीन सीए लैंड के तहत ली जा चुकी है और उसपर प्रतिपूरक वृक्षारोपण कराया जाएगा। प्रोजेक्ट क्षेत्र की जनता को ज्यादा से ज्यादा लाभ मिल सके, इसके लिए विस्थापित हो रहे वैसे लोगों को भी पीडीएफ योजा का लाभ दिया जा रहा है जिनके पास जमीन का स्वामित्व नहीं था। दूसरी तरफ विस्थापितों के लिए लाबिदा में 250 एकड़ ज़मीन पर आरएंडआर कॉलनी का निर्माण प्रगति पर है जो स्कूल, अस्पताल, मार्केटिंग कॉम्पलेक्स , सामुदायिक भवन इत्यादि सुविधाओं से लैस होगा।

 

लेकिन हालत यह है कुछ लोग इस प्रोजेक्ट की दूसरी ही तस्वीर पेश कर रहे हैं जो हकीकत से काफी दूर है। 3 मार्च 2021 को इस प्रोजेक्ट का आवंटन हुआ था और मई 2025 में माइनिंग लीज भी कंपनी को दे दिया गया। कोयला परियोजना के समय से चालू होने से जिस स्तर पर रोजगार का सृजन होना है और जिस तरह से समुदाय के लिए आय के विभिन्न साधनों का निर्माण होना है, वह फिलहाल रुका हुआ है।

 

उल्लेखनीय है कि बंधा कोल प्रोजेक्ट को सिंगरौली और मध्य प्रदेश के सबसे महत्वपूर्ण औद्योगिक निवेशों में गिना जा रहा है। इस परियोजना से न केवल कोयला उत्पादन बढ़ने की उम्मीद है, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार, छोटे व्यवसाय और आधारभूत संरचना के विकास के नए अवसर भी पैदा होने की संभावना है। जानकारों का मानना है कि किसी भी बड़े उद्योग के आने से आसपास के क्षेत्र में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से हजारों लोगों को रोजगार मिलता है। परिवहन, ठेका कार्य, स्थानीय बाजार और सेवा क्षेत्र में भी तेजी आती है। लेकिन बंधा कोल प्रोजेक्ट के शुरू नहीं हो पाने से ये सभी संभावनाएं फिलहाल अधर में लटकी हुई हैं। बंधा कोल प्रोजेक्ट सिर्फ एक औद्योगिक परियोजना नहीं, बल्कि जिले के आर्थिक भविष्य से जुड़ी एक महत्वपूर्ण कड़ी है। और मुआज़ा राशि का भुगतान इस दिशा में सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हो सकता है।