लो जी हो गया फैसला 2027 का उत्तर प्रदेश का भविष्य तय अब करिए समीक्षा

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उत्तर प्रदेश की वर्तमान राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों को देखते हुए, प्रमुख नेताओं और संगठनों के बारे में , उनका एक गहन विश्लेषण।

 

लेखक – स्वतंत्र पत्रकार कृष्ण माधव मिश्रा (केंद्रीय अध्यक्ष केंद्रीय सलाहकार परिषद बीएमएफ नेशनल)

 

रिपोर्ट – राम मिलन जायसवाल।

प्रधान संपादक सिटी टू विलेज, एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष (इलेक्ट्रॉनिक मीडिया सेल बीएमएफ नेशनल)

 

 

*जनता की अपेक्षाओं, शिकायतों और जमीनी* हकीकतों को 10 सकारात्मक और 10 नकारात्मक बिंदुओं के माध्यम से दर्शाया गया है।

*उत्तर प्रदेश 2026: सत्ता, संघर्ष और सामाजिक सरोकार का महासंग्राम,*

उत्तर प्रदेश की राजनीति अब केवल रैलियों तक सीमित नहीं है; यह डिजिटल युग की सतर्क जनता और जागरूक सामाजिक योद्धाओं के बीच का संवाद बन चुकी है।

*1. योगी आदित्यनाथ (मुख्यमंत्री, भाजपा)*

योगी आदित्यनाथ की ‘कठोर’ और ‘विकासोन्मुखी’ छवि के बीच जनता में उनके प्रति मिश्रित रुझान है।

10 सकारात्मक (Positive):

1- अपराध पर अंकुश: माफिया राज और संगठित अपराध के खात्मे से आम जनता में सुरक्षा का भाव।

2- इंफ्रास्ट्रक्चर: एक्सप्रेस-वे और एयरपोर्ट्स के जाल ने प्रदेश की तस्वीर बदली है।

3- धार्मिक पर्यटन: अयोध्या और काशी के कायाकल्प से स्थानीय व्यापार और पर्यटन में भारी उछाल।

4- त्वरित निर्णय: ‘बुलडोजर’ न्याय को जनता के एक बड़े वर्ग ने त्वरित न्याय के रूप में स्वीकार किया।

5- भ्रष्टाचार पर वार: सरकारी दफ्तरों में डिजिटलीकरण से बिचौलियों का प्रभाव कम हुआ।

6- महिला सुरक्षा: ‘मिशन शक्ति’ जैसे अभियानों से सार्वजनिक स्थानों पर सुरक्षा बढ़ी।

7- निवेश: ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट के माध्यम से प्रदेश में भारी निवेश के वादे।

8-साफ नियत: व्यक्तिगत स्तर पर उनकी ईमानदारी और सादगी पर जनता भरोसा करती है।

9- पर्व-त्योहारों पर शांति: बिना दंगों के बड़े आयोजनों का सफल प्रबंधन।

10- राशन योजना: मुफ्त राशन योजना का जमीनी स्तर पर प्रभावी क्रियान्वयन।

 

10 नकारात्मक (Negative):

 

1- बेरोजगारी: युवाओं में सरकारी नौकरियों की कमी और संविदा संस्कृति को लेकर भारी असंतोष।

2- पेपर लीक: भर्ती परीक्षाओं के बार-बार रद्द होने से छात्रों का सरकार पर से भरोसा डगमगाया है।

3- छुट्टा जानवर: ग्रामीण इलाकों में आवारा पशुओं द्वारा फसल बर्बादी एक ज्वलंत समस्या बनी हुई है।

4- महंगाई: रसोई गैस से लेकर पेट्रोल-डीजल की कीमतों ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है।

5- नौकरशाही का दबदबा: जनता और जनप्रतिनिधियों की तुलना में अधिकारियों की मनमानी की शिकायतें।

6- शिक्षा और स्वास्थ्य: ग्रामीण प्राथमिक स्कूलों और स्वास्थ्य केंद्रों की बदहाल स्थिति।

7- अलोकतांत्रिक छवि: विपक्षी आवाजों और आंदोलनों को बलपूर्वक दबाने के आरोप।

8- दलित-पिछड़ा असंतोष: आरक्षण और ‘69000 शिक्षक भर्ती’ जैसे मुद्दों पर पिछड़ों में नाराजगी।

9- कथनी और करनी में अंतर: बड़े निवेश के दावों का धरातल पर न उतर पाना।

10 सांप्रदायिक ध्रुवीकरण: भाषणों में तीखे शब्दों के प्रयोग से सामाजिक ताने-बाने पर असर।

*2. अखिलेश यादव (पूर्व मुख्यमंत्री, सपा)*

 

अखिलेश यादव अब ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के नारे के साथ खुद को एक समावेशी नेता के रूप में पेश कर रहे हैं।

10 सकारात्मक (Positive):

1- प्रगतिशील विजन: लखनऊ-आगरा एक्सप्रेस-वे और मेट्रो जैसी परियोजनाओं के लिए याद किए जाते हैं।

2- PDA समीकरण: पिछड़ों और दलितों को एक मंच पर लाने की सफल कोशिश।

3- युवाओं से जुड़ाव: लैपटॉप वितरण जैसी पुरानी योजनाओं के कारण युवाओं में आज भी लोकप्रिय।

4-लोकतांत्रिक रुख: जनता और मीडिया के साथ अधिक संवाद और सुलभता।

5- मजबूत विपक्ष: सदन से लेकर सड़क तक जन-मुद्दों को प्रखरता से उठाना।

6- जातीय जनगणना की मांग: सामाजिक न्याय के मुद्दे पर पिछड़ों को लामबंद करना।

7- आधुनिक सोच: तकनीक और आधुनिक विकास के पैरोकार।

8- संसाधनों का वितरण: ग्रामीण विकास के लिए ‘समाजवादी पेंशन’ जैसी योजनाओं की स्मृतियाँ।

9- सौम्य व्यवहार: उनके व्यक्तिगत व्यवहार को जनता ‘मर्यादित’ मानती है।

10- गठबंधन की राजनीति: समान विचारधारा वाले दलों को साथ लेकर चलने की क्षमता।

 

10 नकारात्मक (Negative):

 

1- परिवारवाद: पार्टी पर एक ही परिवार के वर्चस्व का पुराना टैग आज भी पीछा नहीं छोड़ रहा।

2- जातिवाद के आरोप: कार्यकाल के दौरान ‘एक विशेष जाति’ को प्राथमिकता देने की छवि।

3- कमजोर कानून-व्यवस्था: उनके शासनकाल को लोग ‘गुंडाराज’ के साथ जोड़कर देखते हैं।

4- सांप्रदायिक तुष्टीकरण: ‘मुस्लिम तुष्टीकरण’ के आरोपों ने हिंदू मतदाताओं को उनसे दूर किया।

5- संगठनात्मक कमजोरी: चुनाव के समय ही सक्रिय होने और जमीन पर संगठन की कमी।

6- भ्रष्टाचार की छाया: उनके कार्यकाल के दौरान हुए खनन और अन्य घोटालों की चर्चा।

7- अधिकारियों पर नियंत्रण की कमी: शासन के दौरान ‘यादव सिंह’ जैसे अफसरों के कारनामों से छवि खराब हुई।

8- अंतर्कलह: परिवार और पार्टी के भीतर पुराने नेताओं और नए चेहरों के बीच खींचतान।

9- बयानों में विसंगति: कभी-कभी गंभीर मुद्दों पर दिए गए बयानों को जनता ‘अपरिपक्व’ मानती है।

10-विपक्ष का बिखराव: अन्य विपक्षी दलों के साथ समन्वय बिठाने में अक्सर असफल रहना।

*3. मिंटू राजभर (राष्ट्रीय अध्यक्ष, भारतीय मतदाता महासभा)*,

मिंटू राजभर के राजनीतिक व्यक्तित्व और उनकी कार्यशैली का 10 सकारात्मक और 10 नकारात्मक बिंदुओं में विस्तृत राजनीतिक विश्लेषण यहाँ दिया गया है:

 

10 सकारात्मक पहलू (Political Positives)

 

1- वोट बैंक की चेतना: उन्होंने पिछड़े और दलित समुदायों में ‘वोट की कीमत’ को लेकर एक नई चेतना पैदा की है, जिससे ये वर्ग अब केवल ‘वोट बैंक’ नहीं बल्कि ‘सचेत मतदाता’ बन रहे हैं।

2- जातीय गोलबंदी में माहिर: उत्तर प्रदेश और बिहार की राजनीति में राजभर और अन्य अति-पिछड़ी जातियों को एक मंच पर लाने में उन्होंने कुशलता दिखाई है भारतीय मतदाता महासभा के पूर्व दो से अधिक राजनीतिक दलों को खड़ा करने में अपनी भूमिका निभाई है।

3- संगठनात्मक विस्तार: एक छोटे स्तर से शुरू करके ‘भारतीय मतदाता महासभा’ को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाना उनके मजबूत संगठनात्मक कौशल को दर्शाता है।

4-दबाव समूह (Pressure Group) की भूमिका: चुनाव के समय यह संगठन एक प्रभावी प्रेशर ग्रुप के रूप में उभरता है, जिससे बड़ी पार्टियां इन वर्गों की मांगों पर ध्यान देने को मजबूर होती हैं।

5- युवा नेतृत्व: वे युवाओं को राजनीति की मुख्यधारा से जोड़ने और उन्हें नेतृत्व के अवसर प्रदान करने में सहायक सिद्ध हुए हैं।

6- सरल संवाद शैली: जनता के बीच उनकी भाषा और व्यवहार बहुत ही सरल और देसी है, जिससे ग्रामीण मतदाता उनसे खुद को आसानी से जोड़ पाता है।

7- संवैधानिक अधिकारों का प्रचार: वे अक्सर अपने भाषणों में संविधान और बाबा साहेब अंबेडकर के अधिकारों की बात करते हैं, जिससे निचले स्तर पर राजनीतिक साक्षरता बढ़ती है।

8- स्वयंसेवी भाव: राजनीति को केवल सत्ता का साधन न मानकर सेवा के माध्यम के रूप में पेश करने की कोशिश करना उनकी एक सकारात्मक छवि बनाता है।

9- सोशल मीडिया का प्रभावी उपयोग: आधुनिक तकनीक के जरिए अपने संदेश को दूर-दराज के क्षेत्रों तक पहुँचाने में वे काफी सफल रहे हैं।

10- विकल्प की तलाश: पारंपरिक बड़ी पार्टियों से असंतुष्ट मतदाताओं को उन्होंने एक नया मंच और विकल्प प्रदान किया है।

 

10 नकारात्मक पहलू (Political Negatives)

 

1- जातिवाद का ठप्पा: संगठन का नाम ‘भारतीय मतदाता महासभा’ होने के बावजूद इसकी पूरी राजनीति राजभर जाति के इर्द-गिर्द सिमटी दिखती है, जो इसे ‘सर्वसमावेशी’ होने से रोकती है।

2- राजनीतिक अवसरवाद: आलोचकों का मानना है कि मतदाता जागरूकता केवल एक मुखौटा है, जिसका असली मकसद चुनाव के समय किसी बड़ी पार्टी के साथ सौदेबाजी करना होता है।

3- ठोस नीतियां: शिक्षा, स्वास्थ्य या रोजगार जैसे बुनियादी मुद्दों पर संगठन सक्रिय तो है पर उनके पास उस पर काम करने वाले टीम की कमी, और विस्तृत विजन या ‘ब्लूप्रिंट’ की कमी दिखाई देती है।

4- व्यक्ति-केंद्रित राजनीति: संगठन में सारा निर्णय और शक्ति केवल मिंटू राजभर के पास केंद्रित है, इनके जैसा कोई प्रखर वक्ता नहीं है वक्ताओं की कमी जिससे दूसरे स्तर के नेतृत्व का विकास नहीं हो पा रहा है।

5- सिद्धांतों में अस्थिरता: गठबंधन की राजनीति के चक्कर में अक्सर वैचारिक समझौता करने के आरोप लगते हैं, जिससे समर्थकों में भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है।

6-शक्ति प्रदर्शन : बड़ी रैलियों और यात्राओं में होने वाले खर्च के स्रोतों को लेकर यात्रा की कमी अक्सर सवालों के घेरे में रहती है।

7- राजनीतिक दायरा: राष्ट्रीय अध्यक्ष होने के बावजूद उनका प्रभाव कुछ विशिष्ट क्षेत्रों (जैसे पूर्वी उत्तर प्रदेश) तक ही सीमित है।

8- अति-उत्साही कार्यकर्ता: कभी-कभी संगठन के कार्यकर्ताओं का आक्रामक व्यवहार अन्य समुदायों के बीच टकराव या तनाव का कारण बन जाता है।

9- भ्रम की स्थिति: भारतीय मतदाता महासभा को एक राजनीतिक संगठन के रूप स्थापित करने और फिर राजनीतिक लाभ लेना जनता के बीच विरोधाभास पैदा करता है।

10- मुख्यधारा की चुनौती: बड़ी और स्थापित पार्टियों के सामने एक स्थायी और विश्वसनीय विकल्प के रूप में खुद को स्थापित कर पाना उनके लिए अभी भी एक बहुत बड़ी चुनौती है।

 

 

*4. एके बिंदुसार (संस्थापक, भारतीय मीडिया फाउंडेशन):*

‘मीडिया सरकार’ का जनता में प्रभाव,

जब हम एके बिंदुसार जी की बात करते हैं, तो उन्हें राजनीति के चश्मे से नहीं बल्कि ‘सामाजिक पहरेदार’ के रूप में देखा जाता है।

पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ताओं का नजरिया:

1- ‘मीडिया सरकार’ की साख: उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल (मिर्जापुर, वाराणसी) से लेकर देश के अन्य हिस्सों तक, कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक उन्हें पत्रकारों का ‘रक्षक’ माना जाता है।

2- मीडिया जनसुनवाई: 15 मार्च जैसे आयोजनों के माध्यम से उन्होंने प्रशासन को जनता के प्रति जवाबदेह बनाने का जो मॉडल पेश किया है, उसकी सराहना हो रही है।

3- निडर नेतृत्व: पत्रकारों पर होने वाले हमलों और फर्जी मुकदमों के खिलाफ उनकी ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति ने उन्हें देशभर के पत्रकारों का मार्गदर्शक बना दिया है।

4- RTI का हथियार: उन्होंने आम आदमी को सिखाया है कि बिना रिश्वत दिए RTI के जरिए अपना हक कैसे लिया जाए।

 

नकारात्मक:

सून्य हैं क्योंकि तार्किक एवं संतुलित समाचारों का संकलन, किसी के विरुद्ध कोई भी गलत टिप्पणी नहीं, हमेशा भ्रष्टाचार एवं अन्याय के खिलाफ अपने लेख के द्वारा जागरूकता अभियान चलाते हैं इसलिए नकारात्मक उनके खाते में नहीं जुड़ता।

सबसे महत्वपूर्ण बात की किसी भी प्रकार की राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं।

 

 

*5- सुश्री मायावती (पूर्व मुख्यमंत्री, बसपा)*

 

10 सकारात्मक बिंदु ।

1. बेदाग प्रशासनिक छवि (L&O)

2. दलित समाज की आज भी एकमात्र बड़ी नेता

3. आर्थिक आधार पर आरक्षण की पुरानी समर्थक

4. कार्यकर्ताओं में आज भी कड़ा अनुशासन

5. कानून का शासन स्थापित करने की मिसाल

6. महिलाओं और शोषितों के प्रति संवेदनशीलता

7. बिना भेदभाव के विकास (जैसे नोएडा का विकास)

8. ब्यूरोक्रेसी पर जबरदस्त पकड़

9. संवैधानिक मूल्यों के प्रति अडिग विश्वास

10. राजनीति में गंभीरता और गरिमा का प्रतीक ।

 

10 नकारात्मक बिंदु

1. जमीनी स्तर पर सक्रियता की भारी कमी

2. युवा दलितों का ‘आजाद समाज पार्टी’ की ओर झुकाव।

3. टिकट बंटवारे में धनबल के हावी होने के आरोप

4. गठबंधन से दूरी बनाकर बीजेपी को लाभ पहुँचाने का टैग

5. कैडर के पुराने और वफादार नेताओं का साथ छोड़ना

6. सोशल मीडिया और तकनीक के दौर में पिछड़ना

7. केवल चुनाव के समय बयान जारी करना

8. सत्ता से लंबे समय तक बाहर रहने से कार्यकर्ताओं में निराशा

9. विपक्षी एकता (I.N.D.I.A.) से दूरी बनाना

10. नई पीढ़ी को नेतृत्व सौंपने में देरी

 

*6- चंद्रशेखर आजाद ‘रावण’ (सांसद, एएसपी)*

 

10 सकारात्मक बिंदु :

1. आक्रामक और निडर छवि

 

2. युवाओं के बीच जबरदस्त आकर्षण

3. पीड़ितों के पास मौके पर पहुँचने की आदत

4. नगीना चुनाव जीतकर अपनी ताकत साबित की

5. सोशल मीडिया का बेहतरीन उपयोग

6. दलित-मुस्लिम एकता के नए सूत्रधार

7. संसद में जन-मुद्दों को प्रखरता से उठाना

8. संविधान की रक्षा को राजनीति का मूल बनाना

9. मध्यम और निचले वर्ग से सीधा जुड़ाव

10. बसपा के विकल्प के रूप में उभरती साख ,

 

10 नकारात्मक बिंदु:

 

1. एक विशेष जाति (जाटव) तक सीमित होने का खतरा

2. बयानों में कभी-कभी उग्रता का होना

3. अनुभवी टीम और संगठन का अभाव

4. अन्य विपक्षी दलों (सपा/बसपा) के साथ तालमेल की कमी

5. ‘आंदोलनकारी’ छवि, प्रशासनिक अनुभव की कमी

6. फंडिंग और संसाधनों के स्रोत पर सवाल

7. अन्य पिछड़ी जातियों में स्वीकार्यता की चुनौती

8. विरोधियों द्वारा ‘अस्थिर नेता’ का लेबल लगाना

9. लंबी अवधि की राजनीतिक रणनीति का अभाव

10. बीजेपी की ‘बी-टीम’ होने के आरोपों का सामना

 

*7- ओम प्रकाश राजभर (राष्ट्रीय अध्यक्ष सुभासपा )*

10 सकारात्मक बिंदु :

1. राजभर समाज में निर्विवाद पकड़

2. अपनी बात बेबाकी से रखने की शैली

3. अति पिछड़ों के हक की आवाज उठाना

4. गठबंधन की राजनीति के माहिर खिलाड़ी

5. छोटे दल को राष्ट्रीय पहचान दिलाना

6. कार्यकर्ताओं के लिए हमेशा उपलब्ध रहना

7. जातिगत जनगणना के पुराने समर्थक

8. पूर्वांचल की दर्जनों सीटों पर प्रभाव

9. सरल और देहाती अंदाज से जनता से जुड़ाव

10. वंचितों को सत्ता की दहलीज तक पहुँचाना

 

10 नकारात्मक बिंदु:

 

1. बयानों में पल-पल बदलाव (पलटूराम की छवि)

2. सत्ता की ललक में विचारधारा से समझौता

3. जनता में ‘अविश्वसनीय नेता’ की पहचान

4. परिवारवाद (बेटों को आगे बढ़ाना) के आरोप

5. विवादित बयानों से अपनी ही गरिमा घटाना

6. चुनाव हारने के बाद पाला बदलने की प्रवृत्ति

7. अति पिछड़ों के लिए धरातल पर काम की कमी

8. गठबंधन सहयोगियों पर सार्वजनिक टीका-टिप्पणी

9. अपनी जाति के बाहर अन्य जातियों में कम पैठ

10. सत्ता में रहते हुए भी काम न करा पाने की शिकायतें,

 

 

*8-अनुप्रिया पटेल: (सांसद, राष्ट्रीय अध्यक्ष अपना दल एस )राजनीतिक भविष्य और जन-समीकरण*

 

10 सकारात्मक बिंदु (Positive Points)

 

1- मजबूत वोट बैंक: कुर्मी समाज (OBC) पर उनकी पकड़ आज भी प्रदेश के कई जिलों (मिर्जापुर, प्रतापगढ़, सोनभद्र आदि) में अटूट है।

2- कुशल वक्ता: वे एक प्रखर और शिक्षित वक्ता हैं, जो अपनी बात संसद से लेकर सड़क तक तार्किक ढंग से रखती हैं।

3- सत्ता में निरंतरता: 2014 से लगातार एनडीए (NDA) का हिस्सा रहने के कारण उनके पास केंद्र में मंत्री पद और प्रशासनिक अनुभव है।

4- साफ-सुथरी छवि: उनके व्यक्तिगत करियर पर अब तक भ्रष्टाचार का कोई बड़ा दाग नहीं लगा है, जिससे जनता में उनकी छवि ‘पढ़ी-लिखी नेता’ की है।

5- महिला नेतृत्व: उत्तर प्रदेश की राजनीति में जहाँ महिला चेहरों की कमी है, वहाँ वे एक स्वतंत्र और सशक्त नेत्री के रूप में उभरती हैं।

6- जाति से परे विस्तार: हाल ही में उन्होंने ‘जाटव’ समाज के नेता आर.पी. गौतम को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर अपने आधार को कुर्मी समाज से बाहर फैलाने की कोशिश की है।

7- भाजपा का भरोसा: वे भाजपा की सबसे पुरानी और भरोसेमंद सहयोगी रही हैं, जिससे उन्हें सीटों के बंटवारे में अच्छी सौदेबाजी की ताकत मिलती है।

8-युवाओं में पैठ: शिक्षित और आधुनिक सोच के कारण नई पीढ़ी के ओबीसी युवाओं के बीच वे एक रोल मॉडल की तरह देखी जाती हैं।

9- क्षेत्रीय विकास: मिर्जापुर और आसपास के क्षेत्रों में विकास कार्यों (जैसे मेडिकल कॉलेज, पुल) का श्रेय जनता उन्हें देती है।

10-रणनीतिक समझ: वे समय की नब्ज पहचानती हैं और ‘ओबीसी’ हितों के लिए सरकार के भीतर रहकर भी आवाज उठाती (जैसे जातिगत जनगणना का समर्थन) रही हैं।

 

10 नकारात्मक बिंदु (Negative Points),

 

1- भाजपा का ‘कुर्मी कार्ड’ (पंकज चौधरी): भाजपा ने हाल ही में सात बार के सांसद पंकज चौधरी को यूपी का नया प्रदेश अध्यक्ष बनाया है। यह अनुप्रिया के ‘एकमात्र कुर्मी नेता’ होने के एकाधिकार के लिए बड़ी चुनौती है।

2- पारिवारिक कलह: अपनी माँ (कृष्णा पटेल) और बहन (पल्लवी पटेल) के साथ जारी राजनीतिक और पारिवारिक लड़ाई उनकी छवि को ‘घर न संभाल पाने’ वाली नेत्री के रूप में पेश करती है।

3- भाजपा पर निर्भरता: आलोचकों का मानना है कि उनका अपना स्वतंत्र अस्तित्व कम होता जा रहा है और वे पूरी तरह भाजपा के रहमोकरम पर टिकी हैं।

4- आरक्षण पर चुप्पी के आरोप: 69,000 शिक्षक भर्ती जैसे मुद्दों पर ओबीसी युवाओं का एक वर्ग उनसे नाराज है कि वे सरकार में मंत्री होकर भी उनके हक के लिए मजबूती से नहीं लड़ीं।

 

5- परिवारवाद के आरोप:

पार्टी के मुख्य पदों और चुनावी टिकटों पर अपने पति (आशीष पटेल) और करीबियों को प्राथमिकता देने से कार्यकर्ताओं में असंतोष रहता है।

6– जमीनी दूरी: कुछ क्षेत्रों में शिकायत है कि मंत्री बनने के बाद उनका जमीनी कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद कम हो गया है।

पल्लवी पटेल का उदय: सिराथू में केशव प्रसाद मौर्य को हराकर उनकी बहन पल्लवी ने खुद को ‘जमीनी और संघर्षशील’ नेता के रूप में पेश किया है, जिससे अनुप्रिया का वोट बैंक बंट रहा है।

7- सीमित प्रभाव: अपना दल (S) का प्रभाव अभी भी केवल पूर्वांचल और बुंदेलखंड के कुछ जिलों तक ही सीमित है; वे पूरे उत्तर प्रदेश की नेता नहीं बन पाई हैं।

8-मंत्रालय बनाम अधिकार: जनता का एक वर्ग मानता है कि वे केवल ‘मंत्री पद’ का सुख भोग रही हैं, जबकि पिछड़ों के बड़े मुद्दों (जैसे पुरानी पेंशन या जातिगत जनगणना) पर सरकार को मजबूर नहीं कर पा रही हैं।

9- सपा का ‘PDA’ मॉडल: अखिलेश यादव के PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले ने ओबीसी मतदाताओं को अपनी ओर खींचना शुरू किया है, जो अनुप्रिया के लिए खतरे की घंटी है।

राजनीतिक भविष्य की दिशा

2027 के विधानसभा चुनाव अनुप्रिया पटेल के लिए ‘अस्तित्व की परीक्षा’ होंगे। 10-उनके भविष्य की दिशा दो बातों पर टिकी है:

क्या वे भाजपा के नए कुर्मी नेतृत्व (पंकज चौधरी, विनय कटियार) के बीच अपना प्रभाव बचा पाएंगी?

क्या वे अपनी पार्टी को केवल ‘कुर्मी पार्टी’ के टैग से बाहर निकालकर एक ‘सर्वसमाज’ की पार्टी बना पाएंगी?

 

जनता का रुझान अब नाम से ज्यादा काम की ओर है। जहाँ योगी और अखिलेश अपनी राजनीतिक बिसात बिछा रहे हैं, वहीं एके बिंदुसार और मिंटू राजभर जैसे व्यक्तित्व व्यवस्था में सुधार और मतदाता के सम्मान की लड़ाई लड़ रहे हैं। 2026 की जनता जागरूक है, वह नेगेटिव बिंदुओं को नजरअंदाज नहीं कर रही, बल्कि उन पर ‘मीडिया जनसुनवाई’ जैसे मंचों पर जवाब मांग रही है।

 

*9- उत्तर प्रदेश की राजनीति में डॉ. पल्लवी पटेल (अपना दल- कमेरावादी)*,

एक ऐसी नेत्री के रूप में उभरी हैं, जिन्होंने बहुत कम समय में अपनी एक अलग पहचान बनाई है।

विशेषकर सिराथू विधानसभा चुनाव में उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य को हराने के बाद वे राष्ट्रीय चर्चा में आईं।

 

10 सकारात्मक बिंदु (Positive Points),

 

1- बड़ी जीत का रिकॉर्ड: सिराथू में बीजेपी के दिग्गज नेता केशव प्रसाद मौर्य को हराकर उन्होंने खुद को ‘जायंट किलर’ के रूप में स्थापित किया।

2- प्रखर और तार्किक वक्ता: डॉ. पल्लवी पटेल अपनी बातों को बहुत ही सौम्य लेकिन तार्किक और तथ्यात्मक तरीके से रखती हैं, जो शिक्षित वर्ग को प्रभावित करता है।

3- सड़क पर संघर्ष: अनुप्रिया पटेल की ‘सत्ता वाली राजनीति’ के विपरीत पल्लवी ने ‘संघर्ष वाली राजनीति’ चुनी है, जिससे वे जनता के बीच अधिक जुझारू दिखती हैं।

4- हक और अधिकार की लड़ाई: पिछड़ों और दलितों के आरक्षण (विशेषकर 69000 शिक्षक भर्ती) के मुद्दे पर वे लगातार मुखर रही हैं।

5- पिता की विरासत की दावेदार: वे डॉ. सोनेलाल पटेल के ‘कमेरा’ (कामगार) दर्शन को आगे बढ़ाने का दावा करती हैं, जो जमीनी स्तर के मजदूरों और किसानों को जोड़ता है।

6- निडर छवि: सरकार की नीतियों के खिलाफ वे बिना किसी हिचकिचाहट के मोर्चा खोलती हैं, जिससे उनकी छवि एक निडर नेता की बनी है।

7- युवाओं और महिलाओं में पैठ: एक उच्च शिक्षित महिला होने के नाते, वे ओबीसी समाज की उन महिलाओं और युवाओं के लिए प्रेरणा हैं जो राजनीति में बदलाव चाहते हैं।

8-अखिलेश यादव के साथ सफल तालमेल: सपा गठबंधन में रहते हुए उन्होंने अपनी बात मजबूती से रखी और गठबंधन को जीत दिलाने में अहम भूमिका निभाई।

9- जातिगत जनगणना की प्रखर मांग: उन्होंने जातिगत जनगणना को अपनी राजनीति का केंद्र बनाया है, जो वर्तमान में यूपी की राजनीति का सबसे बड़ा मुद्दा है।

10-सादगीपूर्ण जीवन: उनके समर्थकों का मानना है कि सत्ता के तामझाम से दूर रहकर वे आज भी आम आदमी के बीच आसानी से उपलब्ध हैं।

 

10 नकारात्मक बिंदु (Negative Points)

 

1- संगठनात्मक कमजोरी: उनकी पार्टी ‘अपना दल (क)’ का ढांचा अभी भी बहुत सीमित है। उनके पास अनुप्रिया पटेल जैसा प्रदेश व्यापी मजबूत संगठन नहीं है।

2- गठबंधन में अस्थिरता: समाजवादी पार्टी के साथ उनके रिश्तों में लगातार उतार-चढ़ाव (जैसे राज्यसभा चुनाव के दौरान नाराजगी) उनकी राजनीतिक स्थिरता पर सवाल उठाता है।

3- परिवारवाद और अंतर्कलह: अपनी सगी बहन अनुप्रिया पटेल के साथ उनकी सार्वजनिक राजनीतिक लड़ाई समाज के एक वर्ग को पसंद नहीं आती, जिसे ‘पारिवारिक झगड़ा’ माना जाता है।

4- सीमित प्रभाव क्षेत्र: उनका प्रभाव वर्तमान में केवल प्रयागराज, कौशांबी और वाराणसी के कुछ हिस्सों तक ही सिमटा हुआ है।

5-अकेले चुनाव लड़ने की क्षमता: राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि वे बिना किसी बड़े गठबंधन (सपा या भाजपा) के अपने दम पर सीटें जीतने की स्थिति में नहीं हैं।

6- विपक्ष में रहने की चुनौती: सत्ता से बाहर होने के कारण उनके पास संसाधनों की कमी है, जिससे वे अपने कार्यकर्ताओं की अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर पातीं।

7- वोट बैंक का बिखराव: कुर्मी वोट बैंक का एक बड़ा हिस्सा अभी भी अनुप्रिया पटेल (बीजेपी गठबंधन) के साथ है, जिससे पल्लवी का आधार बंट जाता है।

8-रणनीतिक स्पष्टता का अभाव: कभी वे सपा के करीब होती हैं तो कभी ओवैसी (AIMIM) के साथ मोर्चा बनाने की चर्चा करती हैं, जिससे मतदाताओं में भ्रम पैदा होता है।

9- बड़े नेताओं की कमी: उनकी पार्टी में उनके और उनकी माता कृष्णा पटेल के अलावा कोई दूसरा बड़ा या प्रभावशाली चेहरा नहीं है।

10-भविष्य का संशय: बीजेपी और सपा जैसे बड़े दलों के बीच उनकी जैसी छोटी पार्टी के अस्तित्व को बचाए रखना और उसे विस्तार देना एक अत्यंत कठिन कार्य है।

राजनीतिक भविष्य की दिशा

डॉ. पल्लवी पटेल की राजनीति की दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि वे आगामी 2027 के चुनाव में किस पाले में खड़ी होती हैं। यदि वे ‘तीसरा मोर्चा’ बनाने की कोशिश करती हैं, तो वे केवल ‘वोट कटवा’ की भूमिका में रह सकती हैं। लेकिन यदि वे किसी बड़े गठबंधन के साथ सम्मानजनक सीटों पर समझौता करती हैं, तो वे उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक निर्णायक भूमिका निभा सकती हैं।

 

अभी जो चर्चा प्रमुख प्रमुख नेताओं को लेकर हुआ इससे यह स्पष्ट होता है कि किसी भी पार्टी या नेता का 2027 में आसान नहीं सत्ता किसके पाले में जाएगी यह अब तय करेगा लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मीडिया।