हजारों कोल वाहनों की आवाजाही के बीच जिम्मेदार विभागों की निगरानी पर ग्रामीणों ने उठाए सवाल

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सिंगरौली। जिले में कोयला परिवहन को लेकर एक बार फिर प्रशासनिक व्यवस्था और जमीनी हकीकत के बीच बड़ा अंतर सामने आने का आरोप ग्रामीणों ने लगाया है। सुलियरी से लेकर सरई क्षेत्र तक चल रहे भारी कोल परिवहन से जहां सड़कों पर धूल और कोयले के कण उड़ने से प्रदूषण बढ़ने की शिकायतें सामने आ रही हैं, वहीं स्थानीय लोगों का कहना है कि परिवहन मार्ग पर नियमित पानी का छिड़काव नहीं किया जा रहा है। इससे राहगीरों, दुकानदारों और आसपास रहने वाले ग्रामीणों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

ग्रामीणों के मुताबिक दिन-रात बड़ी संख्या में कोयला परिवहन करने वाले भारी वाहन इस मार्ग से गुजरते हैं। लगातार वाहनों की आवाजाही से सड़क पर धूल की मोटी परत उड़ती रहती है। स्थिति यह है कि दोपहिया और साइकिल से गुजरने वाले लोगों को कई बार सामने से आने वाले भारी वाहनों के कारण धूल के गुबार का सामना करना पड़ता है। ग्रामीणों का कहना है कि कोयले के महीन कण वातावरण में फैलने से सांस लेने में परेशानी और आंखों में जलन जैसी समस्याओं का खतरा बना रहता है।

सबसे गंभीर सवाल स्कूल जाने वाले बच्चों की सुरक्षा को लेकर उठाए जा रहे हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि स्कूल आने-जाने के समय भारी कोल वाहनों के लिए समुचित कनवाई व्यवस्था दिखाई नहीं देती। कई वाहन तेज रफ्तार से सड़क पर दौड़ते हैं। ग्रामीणों का दावा है कि कुछ भारी वाहन 70 से 80 किलोमीटर प्रति घंटे तक की गति से चलते हैं। ऐसे में सड़क पर पैदल चलने वाले बच्चों, साइकिल सवार विद्यार्थियों और दोपहिया वाहन चालकों के लिए दुर्घटना का खतरा लगातार बना रहता है।

आदेशों की निगरानी कौन कर रहा, ग्रामीणों का सवाल

ग्रामीणों का कहना है कि जिला प्रशासन द्वारा समय-समय पर कोल परिवहन को लेकर दिशा-निर्देश जारी किए जाते हैं। इनमें सड़क पर धूल नियंत्रण, पानी का छिड़काव, वाहनों की गति पर नियंत्रण और स्कूल समय में सुरक्षा व्यवस्था जैसे विषय शामिल हैं। इसके बावजूद सुलियरी से सरई तक जमीनी स्तर पर इन व्यवस्थाओं का प्रभाव दिखाई नहीं देने का आरोप लगाया जा रहा है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि प्रतिदिन हजारों की संख्या में भारी वाहन इस मार्ग से गुजर रहे हैं तो परिवहन व्यवस्था की नियमित निगरानी भी उतनी ही जरूरी है। ग्रामीणों का आरोप है कि कार्रवाई केवल किसी घटना के बाद दिखाई देती है, जबकि परिवहन मार्ग पर रोजाना उत्पन्न होने वाली समस्याओं के स्थायी समाधान की दिशा में प्रभावी कदम नजर नहीं आते।

ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया कि जब वे भारी वाहनों की तेज रफ्तार या अव्यवस्थित परिवहन का विरोध करते हैं तो विवाद की स्थिति पैदा हो जाती है। कुछ लोगों का कहना है कि शिकायत करने पर उल्टा ग्रामीणों पर ही कार्रवाई का दबाव बनता है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। ग्रामीणों की मांग है कि प्रशासन पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराए और परिवहन मार्ग पर सुरक्षा तथा प्रदूषण नियंत्रण की व्यवस्था सुनिश्चित करे।

 

परिवहन एजेंसियों की भूमिका पर भी निगाह

 

क्षेत्र में कोल परिवहन से जुड़े एसीसी कोल परिवहन, धनंजय सिंह, द न्यू सतनाम रोडवेज, मनोज यादव, श्रीराम इंटरप्राइजेज, सौरव सिंह, श्रीजी इंटरप्राइजेज, दिनेश, महाकालेश्वर इंटरप्राइजेज, अमन मिश्रा तथा केपीएस बहारुद्दीन समेत अन्य परिवहन एजेंसियों के वाहनों की आवाजाही को लेकर ग्रामीणों ने सवाल उठाए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि परिवहन कंपनियों और संबंधित एजेंसियों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनके वाहन निर्धारित गति सीमा में चलें, सड़क पर धूल नियंत्रण के लिए आवश्यक पानी का छिड़काव हो तथा स्कूल समय में बच्चों की सुरक्षा के लिए प्रभावी व्यवस्था बनाई जाए। ग्रामीणों का कहना है कि कोयला परिवहन क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन विकास और परिवहन की कीमत आम लोगों की सुरक्षा और स्वास्थ्य से नहीं चुकाई जानी चाहिए। यदि भारी वाहनों की संख्या वास्तव में हजारों प्रतिदिन है, तो सड़क की क्षमता, यातायात प्रबंधन, धूल नियंत्रण और दुर्घटना रोकथाम के लिए विशेष व्यवस्था आवश्यक है।

अब सवाल यह है कि कलेक्टर के निर्देशों के बावजूद यदि सड़क पर पानी का छिड़काव, गति नियंत्रण और स्कूल समय में सुरक्षा व्यवस्था प्रभावी नहीं है, तो इसकी जिम्मेदारी आखिर किसकी है? ग्रामीणों ने जिला प्रशासन, पुलिस, परिवहन विभाग और संबंधित कोल परिवहन एजेंसियों से संयुक्त निरीक्षण कराकर स्थिति स्पष्ट करने और दोष मिलने पर कार्रवाई की मांग की है। साथ ही स्कूल मार्गों पर विशेष निगरानी, नियमित पानी का छिड़काव और तेज रफ्तार भारी वाहनों पर सख्ती की मांग भी उठाई है।